तीन बेटों में एक गलत बेटा

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तीन बेटों में एक गलत बेटा

 

घर में तीन बेटे थे।

 

तीनों एक ही माँ की कोख से पैदा हुए थे, एक ही पिता की छाया में बड़े हुए थे। पिता ने अपनी http://trendsnewsandstoryshindi.in की पूरी कमाई लगाकर तीनों को पढ़ाया-लिखाया और हमेशा यही सिखाया—

 

भाइयों में कभी पैसा मत आने देना, क्योंकि पैसा घर में आता है तो रिश्ते बाहर चले जाते हैं।”

 

दो बेटे पिता की बात समझते थे।

 

लेकिन तीसरा बेटा धीरे-धीरे बदल चुका था।

 

उसकी नजर हमेशा घर की जमीन, दुकान और पिता की जमा पूंजी पर रहती थी।

 

वह सामने से बहुत मीठा बोलता, लेकिन पीछे से भाइयों के बीच गलतफहमियाँ पैदा करता।

 

कभी बड़े भाई से कहता—

 

“पिताजी तुम्हें ज्यादा मानते हैं।”

 

फिर छोटे भाई से कहता—

 

“भैया सारी संपत्ति अपने नाम करवाना चाहते हैं।”

 

धीरे-धीरे दोनों भाइयों के बीच शक पैदा होने लगा।

 

और यही उस तीसरे बेटे की सबसे बड़ी चाल थी।

 

एक दिन पिता बीमार पड़े।

 

तीनों बेटे अस्पताल में थे।

 

पिता ने कांपते हाथों से तीनों का हाथ पकड़कर कहा—

 

“मेरे जाने के बाद घर को मत टूटने देना।”

 

दोनों बेटों की आँखों में आँसू थे।

 

लेकिन तीसरा बेटा चुप था।

 

उसके दिमाग में पिता की तबीयत नहीं…

 

संपत्ति घूम रही थी।

 

कुछ महीनों बाद पिता नहीं रहे।

 

अंतिम संस्कार के बाद जैसे ही घर शांत हुआ, तीसरे बेटे ने असली खेल शुरू कर दिया।

 

कागज निकले।

 

पुराने दस्तावेज निकले।

 

भाइयों पर आरोप लगे।

 

और जिस घर में कभी तीनों भाई एक साथ खाना खाते थे, वहीं अब वकील और मुकदमे की बातें होने लगीं।

 

माँ दरवाजे पर बैठकर रोती रही।

 

वह बार-बार कहती—

 

“मुझे जमीन नहीं चाहिए… मुझे मेरे तीनों बेटे चाहिए।”

 

लेकिन लालच के आगे माँ की आवाज भी छोटी पड़ गई।

 

तब बड़े भाई ने एक दिन अपने दोनों भाइयों से कहा—

 

“अगर संपत्ति के लिए भाई को दुश्मन बनाना पड़े, तो ऐसी संपत्ति मेरे किसी काम की नहीं।”

 

वह अपना हिस्सा छोड़कर घर से चला गया।

 

छोटा भाई भी कुछ दिनों बाद अलग हो गया।

 

घर वही था।

 

दीवारें वही थीं।

 

लेकिन परिवार खत्म हो चुका था।

 

और जिस बेटे ने सबको अलग करके सोचा था कि अब सारी संपत्ति उसकी होगी…

 

एक दिन वह उसी बड़े घर में अकेला बैठा था।

 

चारों तरफ पैसा था।

 

जमीन थी।

 

कागज थे।

 

लेकिन परिवार नहीं था।

 

उस दिन उसे पिता की बात याद आई—

 

“पैसा घर में आता है तो रिश्ते बाहर चले जाते हैं।”

 

उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।

 

लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

 

क्योंकि कुछ रिश्ते टूटने के बाद वापस नहीं आते।

 

घर को आग बाहर का दुश्मन हमेशा नहीं लगाता… कभी-कभी घर के अंदर का अपना ही लालच उसे राख कर देता है।अगर चाहें तो इसे मैं और ज्यादा कड़वा, वास्तविक और कोर्ट-कचहरी वाले पारिवारिक ड्रामे के रूप में लंबा कर सकता हूँ।

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