राजरप्पा Rajrappa और मेरा अधूरा बचपन: 35 साल बाद की कहानी

35 साल की उम्र में पूरा हुआ बचपन का सपना – राजरप्पा की यात्रा

कुछ सपने बचपन में ही जन्म ले लेते हैं।
न उन्हें पूरा करने की जल्दी होती है,
न ही वो ज़िद करते हैं।
वो बस मन के किसी कोने में चुपचाप बैठे रहते हैं—
सालों तक, दशकों तक…
और सही समय का इंतज़ार करते हैं।
मेरा भी एक ऐसा ही सपना था—राजरप्पाMakar sankraanti 2026 special review जाना।
🌱 बचपन की वो अधूरी चाह
बचपन में जब भी घर में कहीं जाने की बात होती,
मैं बड़े उत्साह से पूछता—
“राजरप्पा चलेंगे क्या?”
माँ मुस्कुरा देतीं,
पिता हालात देखकर चुप हो जाते।
कभी पैसे की कमी,
कभी ज़िम्मेदारियाँ,
तो कभी “अभी बाद में”।
और “बाद में” करते-करते
वक़्त आगे बढ़ता गया,
मैं बड़ा होता गया,
लेकिन राजरप्पा…
वो वहीं का वहीं रहा—
मेरे सपनों में।
⏳ ज़िंदगी की दौड़ और सपनों की चुप्पी
पढ़ाई, नौकरी, ज़िम्मेदारियाँ,
घर-परिवार, समाज…
इन सबके बीच
बचपन के सपने अक्सर
सबसे पहले कुर्बान होते हैं।
मैं भी वही करता रहा।
कभी सोचा—“अब ज़रूरी नहीं”
कभी कहा—“फिर कभी”
लेकिन दिल जानता था—
कुछ अधूरा है।
🚶♂️ 35 साल की उम्र और एक फैसला
35 साल की उम्र में,
एक दिन अचानक मन ने कहा—
“अब नहीं तो कभी नहीं।”
न कोई बड़ा प्लान,
न ज़्यादा तैयारी।
बस एक सादा-सा फैसला—
राजरप्पा जाना है।
जब मैं वहाँ पहुँचा,
तो समझ आया—
कुछ जगहें देखने के लिए नहीं होतीं,
महसूस करने के लिए होती हैं।
🌊 संगम के किनारे खड़ा एक इंसान
नदी का संगम शांत था,
लेकिन मेरे भीतर भावनाओं का सैलाब था।
मैंने पानी को छुआ,
और आँखें अपने आप नम हो गईं।
मुझे ऐसा लगा जैसे
मेरा बचपन मेरे सामने खड़ा है—
वही मासूम, वही उम्मीदों से भरा।
मन ही मन मैंने उस बच्चे से कहा—
“देर हुई… पर मैं आया ज़रूर।”
🧠 उस पल की सीख
उस पल मुझे एहसास हुआ—
सपने कभी मरते नहीं,
बस चुप हो जाते हैं।
उम्र चाहे 10 साल की हो
या 35 की,
अगर दिल से चाह हो
तो सपनों तक पहुँचा जा सकता है।
❤️ वापसी में मिला सुकून
राजरप्पा से लौटते समय
मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
क्योंकि अब वो सपना
पीछे नहीं था।
वो मेरे भीतर था—
पूरा, सच्चा और शांत
35 साल की उम्र में मैंने सिर्फ़ राजरप्पा नहीं देखा,
मैंने अपने बचपन से किया हुआ एक वादा निभाया।
और शायद…
यही सबसे बड़ी तीर्थ यात्रा होती है।